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परंपरागत अनाज ‘बिर्रा’ की वापसी, सेहत के लिए माना जा रहा वरदान
मेरठ। बदलती जीवनशैली और बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं के बीच अब लोग फिर से पारंपरिक और पौष्टिक आहार की ओर लौट रहे हैं। इसी कड़ी में उत्तर भारत के ग्रामीण इलाकों में प्रचलित रहा बिर्रा एक बार फिर चर्चा में है। बिर्रा कोई एक अनाज नहीं, बल्कि गेहूं, चना और जौ को मिलाकर तैयार किया जाने वाला मिश्रित आटा है, जिसे पहले किसान एक ही खेत में बोया करते थे।
जानकारों के अनुसार, पुराने समय में किसान गेहूं, चना और जौ को एक साथ बोते थे और कटाई के समय इन्हें ‘बिर्रा’ नाम की मिली-जुली फसल के रूप में प्राप्त करते थे। यह न सिर्फ खेती के लिहाज से फायदेमंद था, बल्कि पोषण के मामले में भी बेहद समृद्ध माना जाता था।
न्यूट्रिशन विशेषज्ञों का कहना है कि बिर्रा का आटा रिफाइंड गेहूं के आटे की तुलना में कहीं अधिक पौष्टिक है। इसमें मौजूद चना शरीर को जरूरी प्रोटीन देता है, जबकि जौ फाइबर का अच्छा स्रोत है। फाइबर पाचन तंत्र को मजबूत करता है और इसे खाने के बाद पेट लंबे समय तक भरा रहता है, जिससे बार-बार भूख लगने की समस्या कम होती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, बिर्रा का सेवन मधुमेह, मोटापा और पाचन संबंधी समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए लाभकारी हो सकता है। इसके अलावा यह आटा बच्चों, बुजुर्गों और मेहनत करने वाले लोगों के लिए भी ऊर्जा का अच्छा स्रोत है।
बढ़ती जागरूकता के चलते अब शहरी क्षेत्रों में भी लोग बिर्रा जैसे पारंपरिक अनाजों को अपनाने लगे हैं। कई स्थानीय आटा चक्कियों पर अब बिर्रा का आटा उपलब्ध होने लगा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लोग अपनी दिनचर्या में ऐसे पारंपरिक और संतुलित आहार को शामिल करें, तो कई आधुनिक बीमारियों से बचा जा सकता है।
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