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धोखे धुंधले क्यों होने लगते हैं?

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जब चश्मे की नहीं, अनुभव की ज़रूरत बढ़ जाती है! कहते हैं उम्र के साथ नज़र कमज़ोर होने लगती है, पर ज़िंदगी का अनुभव बताता है कि सबसे पहले नज़र नहीं—लोगों की पहचान करने की क्षमता कमज़ोर होने लगती है। जब धोखे इतने साफ़-साफ़ मिलने लगें कि आंखें भी उन्हें पहचानते- पहचानते थक जाएँ, तब इंसान मुस्कुराते हुए कह देता है—“अब मुझे भी ज़रूरत पड़ने लगी है चश्मे की, लोगों के धोखे अब ठीक से नज़र नहीं आते…” यह पंक्ति सिर्फ़ एक तंज नहीं, बल्कि आज के रिश्तों की हकीक़त का आईना है।

1. भावनाओं का धुंधलापन: जब दिल भरोसे से थक जाता है

इंसान अपने रिश्तों को दिल से देखता है, लेकिन दिल कई बार वही देखना चाहता है जो सच नहीं होता। यही वजह है कि धोखे अक्सर उसी से मिलते हैं जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा किया गया हो।

धीरे-धीरे भावनाएँ धुंधली पड़ने लगती हैं, और इंसान समझ नहीं पाता कि सामने वाला अपना है या सिर्फ़ दिखावा कर रहा है।

2. चेहरे बदलते हैं, लेकिन इरादे छिपे रहते हैं

आजकल लोग मुस्कुराहट उधार में दे देते हैं, पर नीयत असल में क्या है—यह समझना आसान नहीं।

नक़ली रिश्तों का बाज़ार इतना बड़ा हो गया है कि सच्चे चेहरे पहचानना मुश्किल हो जाता है।

ऐसी स्थिति में, चश्मा आँखों पर नहीं,

सोच और समझ पर लगाना पड़ता है।

3. अनुभव ही असली लेंस है

समय हर धोखे को एक सबक में बदल देता है।

जैसे चश्मा धुंधले दृश्य को साफ़ करता है, वैसे ही अनुभव इंसान को झूठे लोगों को पहचानने की नई दृष्टि देता है।

कुछ लोग कहते हैं—“ज़िंदगी ने बहुत कुछ सिखा दिया।”

असल में यह अनुभव ही है जो हमारी नज़र को तेज़ बनाता है, चाहे उम्र नज़रों को कमज़ोर कर दे।

4. भरोसे की कीमत और टूटने का दर्द

किसी पर भरोसा करना आसान है, लेकिन उसके टूटने का असर दिल की रगों तक महसूस होता है।

हर बार टूटने पर इंसान थोड़ा और सतर्क हो जाता है, और यही सतर्कता उसे आगे आने वाले धोखों से बचाती है।

कई बार लगता है कि चश्मा आँखों के लिए नहीं, दिमाग के लिए चाहिए—ताकि हम हर रिश्ते को साफ़ देख सकें।

5. सीख यही है: नज़र नहीं, नज़रिया बदलें

ज़िंदगी हमें बार-बार यह समझाती है कि समस्या नज़र की नहीं, नज़रिए की है। लोगों को दूर से देखना सीखिए। विश्वास की दूरी बनाए रखें।

और उस चश्मे को अपनाइए जो आपकी भावनाओं को धुंधलाने न दे— वह चश्मा है सावधानी, अनुभव और आत्मविश्वास का।

धोखे दिखाई कम नहीं देते, हम उन्हें अनदेखा करना सीख जाते हैं।

लेकिन जब यह अनदेखापन दर्द देने लगे, तब समझिए कि अब चश्मा बदलने का समय आ गया है— और वह चश्मा सिर्फ़ आपकी आँखों का नहीं, आपके अनुभवों का है।

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