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ज़िंदगी की चादर और घुटने मोड़ने की कला

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ज़िंदगी हमेशा वैसी नहीं होती जैसी हम चाहते हैं। कभी चादर छोटी पड़ जाती है, कभी तकिया कठोर निकल आता है, और कभी बिस्तर ही गायब। लेकिन जो लोग परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालना सीख लेते हैं, उनके लिए हर हालात आरामदेह हो जाते हैं।

यह पंक्ति “जिन्हें घुटने मोड़कर सोना आ गया, उनकी ज़िंदगी में कोई भी चादर छोटी नहीं पड़ती” हमें यही सिखाती है —

अनुकूलता ही जीवन की सबसे बड़ी कला है।

1. शिकायत नहीं, समायोजन जरूरी है

हम अक्सर यह सोचते हैं कि अगर हमारे पास यह चीज़ होती, तो जीवन आसान होता।

लेकिन सच्चाई यह है कि जिनके पास “कम” होता है, वे “ज़्यादा” जीना सीख जाते हैं।

घुटने मोड़ना यानी अपनी इच्छाओं, अपने आराम और अपने अहंकार को थोड़ा छोटा करना।

जब इंसान समायोजन करना सीख जाता है, तो उसकी ज़िंदगी में कोई भी “चादर” छोटी नहीं लगती।

2. परिस्थितियों से लड़ना नहीं, उन्हें अपनाना सीखो

जीवन में हर समय सब कुछ हमारे मुताबिक नहीं होता।

कभी जगह कम होती है, कभी समय।

पर जो लोग परिस्थितियों से जूझने के बजाय उन्हें अपनाने लगते हैं, वही आगे बढ़ते हैं।

वे जानते हैं कि हर स्थिति का एक समाधान है — बस दृष्टिकोण बदलना पड़ता है।

3. लचीलापन ही असली ताकत है

कठोर पेड़ तूफ़ानों में टूट जाते हैं, लेकिन लचीले पौधे झुककर बच जाते हैं।

इसी तरह जो व्यक्ति समय, परिस्थिति और लोगों के अनुसार थोड़ा झुकना जानता है, वही जीवन के हर तूफ़ान से पार निकल जाता है।

घुटने मोड़कर सोना, प्रतीक है इस लचीलेपन का।

4. संतोष: सुख का दूसरा नाम

कभी-कभी ज़्यादा पाने की दौड़ में हम यह भूल जाते हैं कि जो हमारे पास है, वह भी किसी और का सपना है।

जो लोग संतोष का भाव रखते हैं, उन्हें हमेशा चादर पूरी लगती है।

इस पंक्ति में जीवन की सच्चाई छिपी है —

उनके लिए “कम में भी पर्याप्त” होता है।

“अगर हम बदलना सीख लें, तो जीवन कभी छोटा नहीं पड़ता।”

चादर का छोटा होना समस्या नहीं है, समस्या है हमारा “ना झुकना।”

जो झुकना सीख गया, उसने जीना सीख लिया।

संक्षेप में:

👉 समायोजन कमजोरी नहीं, बुद्धिमानी है।

👉 लचीलापन असली ताकत है।

👉 संतोष से बड़ी कोई संपत्ति नहीं।

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