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रेशम की खेती करने से किसानों को होगा बंपर मुनाफा, ऐसे करें जानकारी
Amroha/ढवारसीः जनपद अमरोहा का इकलौता राष्ट्रीय रेशम फार्म ढवारसी में स्थित है। यह करीब पांच एकड़ भूमि में स्थित है। जिले में रेशम कारोबार को बढ़ावा तथा किसानों को रोजगार देने के उद्देश्य से वर्ष 1982 में रेशम फार्म की स्थापना की गई थी। किसानों को रेशम उत्पादन करने वाले कीड़े देकर रेशम उत्पादन कराया जाता था लेकिन, किसानों को रेशम उत्पादन की जानकारी के अभाव में रेशम का कारोबार दम तोड़ रहा है। ऐसे में अधिकारियों के सामने रेशम की खेती को जिंदा रखने की चुनौती बनी है।
रेशम के कीड़े अपने काम को अंजाम नहीं दे पाते
रेशम बाग में एक पुराना कार्यालय तथा एक नवीन भवन है। नए भवन में एक बड़ा हाल तथा दो छोटे कमरे हैं लेकिन, बैठने की कोई व्यवस्था नहीं है। यहां एक चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी भी तैनात है। इन्हें फार्म पर यदा-कदा ही देखा जाता है। फार्म की साफ-सफाई भी समय से नहीं हो पाती है। जानकार लोगों का कहना है कि रेशम उद्योग के दम तोड़ने के लिए बढ़ता प्रदूषण और मौसम का अनुकूल न रहना एक कारण है।
लेकिन इसके अलावा विभाग के अधिकारियों की अनदेखी भी एक मुख्य कारण है। जब एक प्रशिक्षित किसान अमरीश त्यागी से बात की तो उन्होंने बताया कि समय पर वर्षा का न होना, सर्दी एवं गर्मी कम पड़ने की वजह से भी रेशम के कीड़े अपने काम को अंजाम नहीं दे पाते हैं।
रेशम फार्म से किसानों को कोई लाभ नहीं
ढवारसी : करीब 40 साल पहले रेशम फार्म बनकर तैयार हुआ तब लोगों को ऐसा लगा था कि रोजगार मिलना शुरू हो जाएगा। साथ ही रेशम उत्पादन भी होगा लेकिन, किसानों को इसका कोई भी लाभ नहीं मिल पाया। हालांकि रेशम विभाग द्वारा प्रतिवर्ष रेशम के कीड़े किसानों को दिए जाने का दावा किया जाता रहा है। यदि उत्पादन की बात अधिकारियों से की जाती है तो वह इस पर चुप्पी साध लेते हैं।
अगस्त के मध्य से शुरू होता है रेशम उत्पादन का कार्य
रेशम विभाग द्वारा मौसम के हिसाब से दो किस्म के कीड़े जिनमें वाई वोन्टीन यानी सफेद कीड़ा एवं मल्टी वोल्टीन यानी पीला कीड़ा पाला जाता है। कर्मचारी व अधिकारी फार्म पर कभी-कभी आते हैं। रेशम फार्म पर शहतूत के पेड़ों के सिंचाई के लिए नलकूप की भी कोई व्यवस्था नहीं की गई है और न ही फार्म की देखभाल के लिए कोई चपरासी रखा गया है। कीट पालन का कार्य मध्य अगस्त से शुरू हो जाता है।
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