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अंदाज 2: पुराना अंदाज, नई कोशिश, लेकिन असर फीका
Andaz 2 movie review: 2003 में डायरेक्टर सुनील दर्शन ने बॉलीवुड को ‘अंदाज’ दी थी। उस दौर में यह फिल्म अपने स्टारकास्ट और ताजगी भरे अंदाज से दर्शकों के दिल जीतने में कामयाब रही थी। अक्षय कुमार के साथ एक ही फिल्म में दो विश्व सुंदरी—प्रियंका चोपड़ा और लारा दत्ता—को देखना दर्शकों के लिए किसी सपने से कम नहीं था। यह सिर्फ एक रोमांटिक ड्रामा नहीं था, बल्कि 2000 के दशक के शुरुआत में ग्लैमर और इमोशन का बेहतरीन मेल भी था। नतीजा—फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और प्रियंका-लारा, दोनों के करियर को रफ्तार मिली।
लेकिन… वक्त बदल चुका है।
और यही बात ‘अंदाज 2’ में सबसे ज्यादा खलती है।
इस बार सुनील दर्शन ने नए चेहरों के साथ एक और प्रेम त्रिकोण रचने की कोशिश की है। आइडिया भले ही पुराने अंदाज को नया मोड़ देने का था, लेकिन फिल्म अंदाज 2 का ट्रीटमेंट 2000 के शुरुआती दशक में अटककर रह गया।
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कहानी का हाल
स्क्रीन पर रोमांस, इमोशन और ड्रामा तो है, लेकिन सब कुछ इतना घिसा-पिटा लगता है कि दर्शक आधे घंटे में ही अंदाजा लगा लेते हैं कि आगे क्या होगा। नयापन गायब है, संवाद पुराने ज़माने की फिल्मी किताब से निकाले हुए लगते हैं, और क्लाइमैक्स तक पहुंचते-पहुंचते उत्सुकता की जगह ऊब बैठ जाती है।
क्या चुभता है सबसे ज्यादा?
- किरदारों में गहराई का अभाव
- म्यूजिक में वो जादू नहीं जो ‘अंदाज’ के गानों में था
- रोमांस में ताजगी के बजाय रिपीटेशन का एहसास
- आज के दर्शकों की संवेदनाओं और सिनेमाई भाषा से कटाव
सुनील दर्शन की मेहनत और इरादा साफ दिखता है, लेकिन सिनेमा अब 2025 में है—जहां दर्शक तेज, सटीक और इनोवेटिव कहानियां चाहते हैं। ‘अंदाज 2’ इस बदलते अंदाज को पकड़ने में नाकाम रही है।
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इरादा सराहनीय
पुराने दौर की यादें ताज़ा करने का इरादा सराहनीय है, लेकिन कहानी, स्क्रीनप्ले और ट्रीटमेंट में वक्त के साथ कदम मिलाना जरूरी था। ‘अंदाज 2’ इस मामले में पिछड़ जाती है। नतीजा—ना तो पुरानी फिल्म जैसी नॉस्टैल्जिया देती है, ना ही नई पीढ़ी के लिए कोई खास आकर्षण छोड़ती है।
कभी-कभी, सिर्फ नाम और यादें काफी नहीं होते…
सिनेमा में अंदाज़ भी वक्त के साथ बदलना जरूरी है।
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